इलेक्ट्रो होमियोपैथिक चिकित्सा विज्ञान के अविष्कारक डा. काउन्ट सीजर मैटी जी की 214वीं जयंती

203

✒️चंद्रपूर (विदर्भ प्रतिष्ठा न्यूज नेटवर्क)

चंद्रपूर (दि.11 जानेवारी)

संक्षिप्त परिचय

इलेक्ट्रो होमियोपैथिक चिकित्सा विज्ञान के अविष्कारक डॉ काउन्ट सीजर मैटी जी का जन्म इटली देश के बोलोग्ना शहर में 11 जनवरी 1809 को एक जमींदार परिवार में हुआ था। उनके द्वारा किये गये इस अनूठे अनुसंधान कार्य के लिये सारे विश्व भर में इलेक्ट्रो होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति के अनुयायी आज के दिन उन्हें याद करते | आज हम उनकी *214 वी जयंती* अखिल भारतीय स्तर पर मना रहें है। इस अवसर पर पूरे मध्य प्रदेश सहित देश के अन्य प्रदेशो में भी *मैटी दिवस* के रूप में बड़े धूमधाम से मनाया जाता हैं।

डॉ काउन्ट सीजर मेटी ने इलेक्ट्रो नामक हानिरहित,सरल,सस्ती, प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक चिकित्सा प्रणाली की खोज सन् 1865 में की थी। आज यह पद्धति विश्व के अनेक देशों में प्रचलित है। भारत वर्ष में लगभग 5 लाख इलेक्ट्रो होमियोपैथिक के चिकित्सक शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत है।

डॉ मैटी ने भारतीय आयुर्वेद को इलेक्ट्रो होमियोपैथी के रूप मे पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। जिसे सारे विश्व मे सराहा जा रहा है। डॉ मैटी ने *रस और रक्त* को मुख्य आधार बनाकर वनौषधियों से अपनी दवायें बनाकर रोगों से पीड़ित दु:खी मानव को एक आसान रास्ता देकर मानवता की सेवा की है।

इसी कारण सारे चिकित्सकगण मिलकर प्रतिवर्ष 11 जनवरी को *मैंटी दिवस* बड़े धूमधाम से मनाते है।

*चिकित्सा पद्धति का परिचय :-* डा काउन्ट सीजर मैटी ने इस पद्धति की खोज के लिये अपने कुत्ते से प्रेरणा ली। एक दिन बाग में बैठे हुये उन्होने देखा कि कुत्ते के त्वचा में तकलीफ थी कुत्ता विशेष किस्म की घास को सूंघ कर उस पर लोटने लगा और कई दिन तक इस प्रक्रिया को दोहराने के उपरान्त उसका घाव ठीक हो गया। डा मैटी को इस घटना से बड़ी प्रेरणा मिली और उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र मे अध्ययन करते हुए चौदहवीं सदी के दार्शनिक पैरासेल्सस के साहित्य में *”पौधों के अंदर विद्युतीय शक्ति होती है”* का वाक्य पढ़कर तुरंत इसी बात को आधार मानकर कार्य करने लगे। धीरे-धीरे उन्हें सफलता मिलती चली गई और *सन1865 में उन्होंने इस पद्धति का नाम “इलेक्ट्रो होम्योपैथी किया।*

*नाम परिचय* डॉ मैटी ने इस पद्धति के नाम में तीन शब्दों का प्रयोग किया जिसमे *इलेक्ट्रो’ शब्द का अर्थ यहां पर त्वरित या बिजली* से लिया गया हैं जो बनस्पति विद्युतीय शक्ति को तथा दवा की कार्यप्रणाली को इंगित करता है। *”होम्यो शब्द” शरीर की संतुलनावस्था अर्थात होम्योस्टेसिस* पर केन्द्रित है और *”पैथी” शब्द चिकित्सा विज्ञान* की ओर इंगित करता है। अतः कहा जा सकता है कि

इलेक्ट्रो होमियोपैथी वह पद्धति है जिसमें वनस्पतीय औषधियों की तीव्र कार्य प्रणाली से शरीर के रोगों को ठीक करने की क्षमता रखती है।

*सिद्धान्त:-* डॉ मैटी ने इस पद्धति का मुख्य आधार शरीर के अन्दर मौजूद रस अर्थात लसिका एवं रक्त को बनाया। उन्होंने बताया कि शरीर में रस और रक्त नामक दो मुख्य द्रव्य पदार्थ पाये जाते हैं और इन्ही पदार्थों के दूषित होने या असमानता से शरीर में समस्त रोगों की उत्पत्ति होती है तथा वनस्पति विद्युतीय शक्ति से सपन्न इन प्राकृतिक औधियों से सभी प्रकार के रंगों का ठीक किया जा सकता है। डॉ मैटी ने रोम के हॉस्पिटल में सन् 1867 से 1869 के मध्य लाखों रोगियों को इन दवाओं से अन्य कर इन् औषधियों की प्रमाणिकता को सिद्ध कर दिया है।

*चिकित्सा एवं सेवा कार्य:-* आज सारे भारत ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान,अरब देश,केन्या,घाना, मारीशस,जर्मनी,ऑस्ट्रेलिया,अमेरिका एवं इंग्लैंड में इलेक्ट्रो होमियोपैथिक के चिकित्सक डॉ मैंटी के बताये हुये रास्ते पर चलकर आम जनता की सेवा कर रहें है। वहीँ भारतीय चिकित्सक विशेषकर 80 प्रतिशत ग्रामीण जनता की सेवा में संलग्न है।

*अतः आज हम डा मैटी जी की 214वी जयंती के अवसर पर बारम्बार नमन करते हुए अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते है 

इस पावन स्मृती पर शत शत नमन.. डॉ.इस्माईल पठाण शेगाव बू. ओर डॉ.कमलाकर चांभारे चारगाव बू.

भवदीय

 

(डा. अमित सिंह)

अध्यक्ष

“डां.मैटी सेवा संस्थान” सतना (म.प्र.)